धूल

कल की सोच के चश्मे पर लगी धूल
साफ करने की कोशिश करता हूं
तो अतीत की चमक नज़र आती हैं।

वो अंधेरी रातों की यादे आंखों पर आहट ले आती है
लेकिन सुबह होते ही सब भुल जाने की आदत मुंह पर मुस्कुराहट छोड़ जाती है।

वो कालियो जैसे रिश्ते बहार की राह देखते थे और अपनों की ही परछाइयां पीछे छूट जाती है।

उस समय वो लोग भी क्या मिले थे मुझे आज उनकी बातों को याद करता हूं तो कहावत बन जाती है।

क्या करूं?
ये यादें हिमालय जैसी उंचाईओ की घबराहट ले आती है तो वो यारों की बातें उसमें गर्माहट महसूस कराती है।

उनको अपना कीतनाभी रूठापन दिखा दूं वो अपनो को दी हुई ज़ुबान शराफत ले आती है।

इन सब में से बाहर निकल ने की कोशिश करता हूं तो चश्में पर वापस धूल जम जाती है।

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